हस्तरेखा शास्त्र भारतीय वैदिक ज्ञान की एक प्राचीन और गहन शाखा है, जिसे सामुद्रिक शास्त्र के नाम से जाना जाता है। इस शास्त्र की रचना महर्षि समुद्र से जोड़ी जाती है और इसमें केवल हथेली की रेखाओं का ही नहीं, बल्कि शरीर के विभिन्न अंगों की बनावट और संकेतों के आधार पर व्यक्ति के स्वभाव, मानसिक प्रवृत्ति और जीवन के संभावित मार्ग का अध्ययन किया जाता है। इस दृष्टि से मानव शरीर को संकेतों की एक समग्र प्रणाली माना गया है।
हस्तरेखा शास्त्र, कर्म और भारतीय दृष्टिकोण: पश्चिमी देशों में हस्तरेखा शास्त्र को कीरोमंसी कहा गया, जहाँ इसे मुख्य रूप से भविष्यवाणी से जोड़ा गया। इसके विपरीत, भारतीय परंपरा में यह शास्त्र केवल भविष्य बताने का साधन नहीं है, बल्कि कर्म और प्रारब्ध के बीच संतुलन को समझाने का माध्यम रहा है। ऋषियों का मानना था कि हथेली की रेखाएँ संभावनाएँ दर्शाती हैं, जबकि वास्तविक जीवन की दिशा व्यक्ति के कर्म तय करते हैं। इस प्रकार हस्तरेखा भारतीय दर्शन में आत्मबोध, आत्मविकास और जिम्मेदार जीवन की प्रेरणा देती है।